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लहू की लकीरें

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लहू की लकीरें

उम्मीद की खरोचो से जो लाल धारा बही थी।
देखा तो जाना की वो देश के उधड़े शरीर की थी॥
वही लालिमा की सियाही हर आँख में दिखेगी।
लहू की लकीरें अब किस्मत नयी लिखेंगी॥

न सोचना की हम लाचार हें, कमजोर हैं, यहाँ पर।
आज हो ही जाए सामना, तुम चाहो जहां, वहाँ पर॥
हर चोट से मेरी, साँसे तेरी रुकेंगी।
लहू की लकीरें अब किस्मत नयी लिखेंगी॥

इतिहास भी गवाहा है सरफरोश मुरीदों के।
हम भी वंशज है उन वतन के शहीदों के॥
क्या मारो तुम हमको जब गर्दन नयी सजेगी।
लहू की लकीरें अब किस्मत नयी लिखेंगी॥

एक आस एक विश्वास से हमने तुम्हें चुना था।
अब लगता है की चुनना सबसे बड़ा गुनाहा था॥
एक अंधी से उडी तो तुम्हारी बिसात नहीं मिलेगी।
लहू की लकीरें अब किस्मत नयी लिखेंगी॥

चुप-चाप तुम समझलों मेरी देश की तकलीफ।
यह हक़ हें मेरा नहीं मांगी है कोई भीख॥
या फिर ज्वाला जो भड़केगी तो रोके नहीं रुकेगी।
लहू की लकीरें अब किस्मत नयी लिखेंगी॥



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