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मेरी तुम

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इस खामोश रात के अंधेरे में।

तुम्हारी ही बात सुनाई देती है॥

तुम साथ नहीं होती और।

तुम्हारी सूरत दिखाई देती है॥

 

कही से हवा के तेज़ चलने की आवाज़ भी आ रही है।

 पत्तों की सरसराहट से खामोशी जा रही है॥

 

बारिश का मौसम है यहाँ।

मौसम में नमी है॥

दिल में उठती एक कसक है।

इस पल में कुछ कमी है॥

 

पानी की फुहार से।

सड़क भीग गयी है॥

हवा कुछ गीली सी है।

और सौंधी महक भी है॥

 

और गहरा गयी है रात।

समय के हर पल के साथ॥

और खामोश हो गयी है।

और अंधेरी हो गयी है रात॥

 

नींद क्यों आँखों में नहीं है।

सपनों में कुछ देखने को नहीं है॥

और फिर याद भी तो करना है।

तुम्हें, तुम्हारी आखें, चेहरा जो हसीं है॥

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

nikhil के द्वारा
May 30, 2011

प्रिय मारवाह जी सुन्दर रचना. बधाई.

    dalveermarwah के द्वारा
    June 6, 2011

    धन्यवाद निखिल जी।

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
May 30, 2011

दलवीर मारवाह जी -सुन्दर रचना प्रेम की भीनी भीनी खुश्बू लिए रातों को जगा रही है सच में दुरी बढ़ने से कुछ कमी तो खलती ही रहती है -निम्न पंक्ति धारा प्रवाह करती सुन्दर बारिश का मौसम है यहाँ। मौसम में नमी है॥ दिल में उठती एक कसक है। इस पल में कुछ कमी है॥ शुक्ल भ्रमर ५

    dalveermarwah के द्वारा
    June 6, 2011

    बेहद अच्छा लगा जानकार की रचना पसंद आयी। धन्यवाद सुरेन्द्र जी।


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