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नहीं आती

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मेरे न होके भी वो मेरे ही रहेंगे ।

उन्हे खुद को चुराने की कला नहीं आती ॥

इस हाल-ए-दिल को मलहम न करो ।

क्योंकि दर्द-ए-दिल की दवा नहीं आती ॥

 

बहुत मजबूर है वो जो मुझेसे दूर बैठे है।

उन्हे वापस आने की राह नज़र नहीं आती ॥

कभी बुला लिया था मुझे अपना जानशी कहके ।

तो फिर क्यों आशिक-ए-बीमार की कदर नहीं आती ॥

 

की मायूस बैठे है यह पर्वत झील फूल और पत्ते।

की मौसम-ए-बाहार भी अब इस तरफ नहीं आती॥

मुझे आपकी नजरंदाजी कबूल है लेकिन।

कुदरत को आपकी तबीयत समझ नहीं आती ॥

 

अब लगता है वो मुझे भूल गए होंगे ।

की साँसो से अब उनकी महक नहीं आती ॥

न पूछो मैं जिंदा हूँ या जी रहा हूँ मैं ॥

की धड़कन जो जाती है तो वापस नहीं आती ॥

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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
May 4, 2011

दलवीर जी, आपने बहुत अच्छी रचना की है | बधाई …

संदीप कौशिक के द्वारा
April 25, 2011

दलवीर जी, इतनी खूबसूरत और ज़िंदादिल रचने के लिए आपको बधाई | निम्न पंक्तियो ने तो जैसे गागर में सागर भर दिया… मुझे आपकी नजरंदाजी कबूल है लेकिन। कुदरत को आपकी तबीयत समझ नहीं आती ॥ पढ़कर बहुत अच्छा लगा !!

    संदीप कौशिक के द्वारा
    April 25, 2011

    कृप्या रचने को रचना पढ़ा जाये |  त्रुटिवश ऐसा लिखा गया था |

    dalveermarwah के द्वारा
    April 26, 2011

    संदीप जी, बस एक कोशिश की है। आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद।

abodhbaalak के द्वारा
April 25, 2011

कुछ हो न हो, आपको लिखने की कला “अवश्य आती ” है :) सुन्दर रचना. ऐसे ही लिखते रहें http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    dalveermarwah के द्वारा
    April 26, 2011

    नमस्ते, मुझे खुशी है की रचना आपको पसंद आयी। आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद।


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