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अब बस पूर्णविरम

Posted On: 20 Apr, 2011 में

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मेरी आदत है सब सहने की
गलत होता देख चुप रहने की
 
अब कल ही की बात है
मुझे आच्छी तरह याद है
करवाना एक काम जरूरी था
रिशवंत देना शायद मजबूरी था
 
मेरी विवशता उसका ईनाम बनगई
मेरी आत्मा कुछ और बेमान बनगई
ऐसे और कितने कर्म रोज़ घटित होते है
कितने ही लोग देख के भी चुपचाप सोते है
 
मे भी उनमे से एक ही हूँ
पर अब सोचता हूँ की बस करूँ
रोक लो अपनी विवशता को
फिर भले ही थोड़ा कष्ठ हो
छेड़ दो एक संग्राम
अब बस पूर्णविरम

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

roshni के द्वारा
April 21, 2011

छेड़ दो एक संग्राम अब बस पूर्णविरम बिलकुल सही अच्छे विचार

    dalveermarwah के द्वारा
    April 25, 2011

    इस प्रयत्न पर प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद। एक और नयी कविता कहने की कोशिश की है।

rahulpriyadarshi के द्वारा
April 21, 2011

इस दुविधा के भंवर से तो गुजरना ही पड़ता है,अपने काम में न चाहते हुए भी ऐसे समझौते करने पड़ते हैं,पूर्णविराम की अनिवार्य आवश्यकता है,बहुत अच्छी उद्देश्यपरक रचना है,आपको शुभकामनाएं.

    dalveermarwah के द्वारा
    April 25, 2011

    धन्यवाद विषय और विचार को समझने के लिए। यह मेरे लिए प्रोत्साहन है।


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